Upendra Nath Rajkhowa : भारत के एक-लौते जज जिन्हे दी गई थी फांसी की सजा.

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Upendra Nath Rajkhowa : भारत के एक-लौते जज जिन्हे दी गई थी फांसी की सजा.
Upendra Nath Rajkhowa : भारत के एक-लौते जज जिन्हे दी गई थी फांसी की सजा.

Upendra Nath Rajkhowa आज भी रहस्य है उपेंद्र नाथ राजखोवा के अपराध के पीछे की वजह.

नई दिल्ली| भारत उपेंद्र नाथ राजखोवा (Upendra Nath Rajkhowa) एक लोअर कोर्ट जज थे 1969 में जज साहब की पोस्टिंग असम के धुबरी जिला में लोअर कोर्ट जज के तौर पर हुई थी अपने नौकरी के चलते वो कई अलग अलग जगह पोस्टेड भी रहे उन्होंने अपने जीवन कई बड़े मामलों में फैसला भी सुनाया था, जिसमें कई लोगों को उम्र कैद जैसे सजा भी सुनाई थी । भारत के संविधान में फांसी की सजा का प्रावधान है और अन्य कई देशों की तरह यहाँ आज भी फांसी दी जाती है । भारत में ऐसे कई जज है जिन्होंने कभी न कभी किसी न किसी को फांसी की सजा सुनाई हो। उपेंद्र नाथ राजखोवा एक मात्र जज है जिहने फांसी की सजा दी गई थी।

फांसी की सजा देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कई गाइड लाइन जारी किये है, अपने आदेशों में साफ किया है कि फांसी की सजा तभी दी जाए जब अपराधी ने जो अपराध किया हो वो रेयरेस्ट ऑफ रेयर यानि जघन्य अपराध की श्रेणी में आता हो। अब आप ये अंदाज लगा सकते है की अपराध कितना संगीन था की अपराधियों को सजा सुनाने वाले एक न्यायाधीश को ही फांसी की सजा सुनाई गई हो।

उपेंद्र नाथ राजखोवा (Upendra Nath Rajkhowa) के धुबरी पहुंचने के बाद से शुरू हुई ये कहानी। धुबरी आने के बाद उपेंद्र नाथ को सरकारी बांग्ला नहीं मिला फिर वो वह के सर्किट हाउस में रहने लगे कुछ दिनों के बाद उन्हें सरकारी बांग्ला अलॉट हुआ उस के बाद वो बंगले में शफ्ट कर गए। बंगले में जाने के बाद उन्होंने अपने परिवार को धुबरी बुलालिया इनके परिवार में 4 लोग थे इनकी पत्नी नाम पुलोती राजखोवा बड़ी बेटी निर्मला, मजलि बेटी जोनाली और छोटी बेटी रुपाली तीनों बेटियां गोवाहाटी में कॉलेज पढ़ रही थे और गोवाहटी स्तिथ इनके घर में इनकी पत्नी के साथ रहते थे।

2 फ़रवरी 1970 में इनको रिटायर होना था (Upendra Nath Rajkhowa) तब उन्होंने अपनी पूरी फैमली को धुबरी बुला लिया और इनकी पत्नी और बीवी वही कुछ दिनों ने लिए ठहर गए । उस समय स्वरस्वती पूजा की छुट्टी चल रही थी इन के रिटायरमेंट के पहले इनका परिवार कई बार धुबरी आया और जाया । 2 फ़रवरी 1970 में रिटायर होना के बाद वो कुछ दिन अपने सरकारी बंगले में अपने परिवार के साथ रहने लगे ।

कुछ दिनों के बाद वो अपनी दो बेटियों को वापस गोवाहाटी भेज देते है क्यूकी उनके परीक्षा आने वाले थे । अपनी बीवी और बड़ी बेटी को वो अपने साथ रोक लेते है । उनके बंगले में बाथरूम से लगा हुआ एक पेड़ था जिसके डालियाँ बहुत बड़ी थी वो अपने नौकर को बुलाते है और उसे कहते है की इस पेड़ को काट डालो उसके बाद जब पेड़ कट गया तो उन्होंने अपने नौकर से कहा की इसे जड़ से निकाल दो पेड़ को जड़ से निकलने के बाद उन्होंने अपने माली को कहा की अब इस जगहे पर एक बड़ा गड्ढा बना दो मई कुँजबिहार से कुछ पौधे ला कर यहाँ लगाऊंगा माली उनके कहे अनुसार गढ़ा को बड़ा कर देता है।

फिर 2 दिन के बाद जज साहब की बीवी की नज़र उस गड्ढे पर पढ़ती है क्युँकी उस वक़्त जज साहब घर पर नहीं थे तो वो अपने माली को बोल कर उस गड्ढे को बंद करवा देती है। जब जज साहब घर वापस आते है तो उस गड्ढे को बंद देख कर जुस्सा हो जाते है वो अपने माली को फिर से उसे वैसा करने को कह देते है। और माली उनके कहे अनुसार गड्ढे को वापस खोद देता है। 2 दिन  बीतने के बाद जज साहब अपने माली को बुलाते है और किचन के पीछे के एक पेड़ को  काटने बोलते है और वह भी एक बड़ा गड्ढा बनाने को बोलते है माली ने जज के कहे अनुसार वहाँ पर भी वैसा ही गढ़ा खोद देता है।

10 फरवरी शाम को वो अपने नौकर, माली को छुट्टी देते है कहते है की तुम लोग जाओ पूजा देखो घूमोफिरो वो सरे नौकर चले जाते है ।उसके बाद जसगी साहब अपने बेटी और बीवी के साथ घूमने चले जाते है पूजा देखते है फिर रात को घर चले जाते है घर आने के बाद वो लोग खाना कहते है फिर अपने कमरे में चले जाते है उसके बाद उनके सारे नौकर भी अपने कमरे के सोने चले जाते है।

वह आखरी बार उन लोगों ने जज साहब की बीवी और बेटी को देखा। अगले दिन सुबह होती है फिर जब नौकरों ने देखा की मेमसाहब और उनकी बेटी घर पर नहीं है तो वो जज साहब से पूछते है की वो कहा है जज साहब कहते है की उनके एक रिश्तेदार की तबियत ख़राब है और वो दोनों वही गए है देर रात को उनका फ़ोन आया था और वो लोग सुबह सुबह रवाना हो गए । नौकरो को ये बात अजीब लगती है पर फिर वो सोचते है की शायद इमरजेंसी थी इसी किये चले गए।

इसके बाद सारे नौकर अपने काम पे लग जाते है अचानक उनमे से एक की नज़र वाशरूम के पाइप पर पढ़ती है और वो देखता है की लाल रंग का पानी जैसा पाइप से बहार निकल रहा है फिर वो अंदर जाता है देखने की ये पानी कहा से आ रहा है तो वो देखता है की जज वह कपडे चादर धो रहे है चादर लाल रंग का था तो उसे लगता है की शायद चादर रंग छोड़ रहा है पर उसे एक बात अजीब लगती है की जज साहब खुद कपडा धो रहे है।

क्युँकी वो किसी से भी कह सकते थे धोने के लिया और क्युँकी इन लोगों को करीब एक साल हो गया था जज साहब के यहाँ नौकरी करते उन लोगों ने कभी उन्हें कपडा धोते नहीं देखा फिर उसे लगता है शायद अपना समय काटने के लिए काम कर रहे है क्युँकी वो अब रिटायर हो चुके है।

इसके बाद वो नौकर फिर बाहर आता है तो उसकी नज़र उस गड्ढे पर पढ़ती है जिसे उसने खोदा था वो देखता है की गड्ढा बंद कर दिया गया है और जैसा जज साहब ने कह था की उस पर वो पौधा लगाएंगे पर वह किसी भी पौधे को नहीं लगाया गया था उसे फिर शक होता है की माजरा क्या है पर वो इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता और अपना काम करने लगता है।

इसके बाद 14 फरवरी को जज साहब गोवाहाटी के अपने रिश्तेदार को फ़ोन करते है जहा उनकी दोनों बेटी रहते थे और उनको बोलते है की उन दोनों को मेरे पास भेज दो हमें घूमने जाना है उनके रिश्तेदार ने उनसे कहा की बच्चो का एग्जाम आने वाला है तो वो कैसे वह जाएंगे पर जज साहब नहीं मानते वो उन पर जोर डालते है कहते है की पहले से प्लान बना रांझा है उन दोनों को भेज दो उनके रिश्तेदार को ये बात अजीब लगती है पर वो कुछ नहीं कहते है और जज साहब की बेटियों को वह से भेज देते है ।

अगले दिन उनकी दोनों बेटी धुबरी आ जाते है सभी नौकरों ने उनकी दोनों बेटी को देखते है और सब शक दूर हो जाता है कुछ दिनों के बाद 23 फरवरी को सुबह होती है और फिर उनके नौकरों ने देखा की दोनों बेटी घर पर नहीं है और वो जज साहब से पूछते है की वो कह है तो जज साहब कहते है की वो कोकड़ा-धार गये है अपने माँ के पास और शायद मुझे भी जाने पढ़े।

इसके बाद नौकर अपने काम पर लग जाता है फिर अचानक उन्हे दीखता है की किचन के पीछे वाला गड्ढा  भी भरा हुआ है और उस पर भी कोई पौधा नहीं लगा है उन्हें ये बेहद अजीब लगता है पर वो इस पर ज़्यदा ध्यान नहीं देते है। मार्च पुरे महीने जज साहब उसी बंगले में रहते फिर १५ अप्रैल को वो बांग्ला छोड़ देते है और धुबरी से चले जाते है।

इसके बाद इनका एक नौकर जयप्रकाश इन्हे मई 1970 में इन्हे सिलीगुड़ी में मिलता है जज साहब जयप्रकाश के घर जाते है और उसे कहते है की वो किसी काम से आये है और एक होटल में रुके है वो जयप्रकाश से कहते है की किसी को मत बताना की मई यहाँ रुका हु इसके बाद वो 3 दिन जयप्रकाश के घर में रुकते है फिर चले जाते है

जज साहब के बहनोई ब्राता शर्मा असम में DIG दीप्ती इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस असम थे , मई का महीना था और जज साहब के बहनोई को ४ महीने से अपनी बहन भान्जियों की कोई खबर नहीं मिल रही थी और इस बिच वो जब भी जज साहब से उन लोगों के बारे में पूछते तो जज साहब कहते की वो दिल्ली में है तो कभी कहते है की वो गोवाहाटी में है

उन्हें शक होता है क्युकी उनकी भान्जियों की परीक्षा भी थी पर फिर भी वो कही और थे और ऐसा कभी नहीं हुआ की इतने दिनों तक वो इनसे संपर्क में ना हो और कुछ दिनों के बाद जज साहब भी उनका संपर्क नहीं हो पा रहा था । कुछ और दिनों के बाद भ्राता शर्मा धुबरी पहुंचे और जज साहब के पुराने बंगले में पहुंचते है और वह के नए जज से मिलते है उनको बताते है की पिछले तीन महीनों से उनका अपनी बहन और भान्जियों कोई संपर्क नहीं है और कुछ दिनों से उनके जीजाजी से भी संपर्क नहीं हो पा रहा है ।

नए जज साहब कहते है की उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता और उस बंगले के नौकर भी उन्हें कुछ नहीं बता पते । इसके बाद वो कोर्ट जाते और वह जज साहब का अर्दली जयप्रकाश उन्हें मिलता है। जयप्रकाश उन्हें बताता है की कुछ वक़्त
पहले जज राजखोआ उससे सिलीगुड़ी में मिले थे और ये बताया की वो वाहा के एक होटल में रुके थे ।

इसके बाद DIG सिलीगुड़ी पहुंचते है और वह के लोकल पुलिस के साथ उस होटल जाते है जहा जज साहब रुके हुए थे। वो जज साहब के कमरे में पहुंचते है और अंदर जाने के बाद पूछते है की उनकी बहन और भांजियां कहा है जज साहब कहते है की वो दिल्ली में है पर DIG साहब ने पूछा की अगर वो दिल्ली में है तो वह के किसी रिश्तेदार को उनकी जानकारी क्यों नहीं है। DIG साहब ने एक एक कर के कई सवाल करना शुरू कर दिया उसके बाद जज साहब ने कहा की वो जो बताना चाहते है उसे वो लिखकर देंगे।

उसके बाद जज साहब ने पेपर पर लिखा की 10 फरवरी को उनकी पत्नी घर में पैर फिसलने से गिर पड़ी और मौके पर ही उसकी मौत हो गई इनकी बड़ी बेटी ने जब अपने मॉक मो मृत पाया तो वो ये बर्दाश नहीं कर पाई और उसने नींद की गोली खा कर अपनी जान दे दी । पूरी रात वो इन दोनो के लाश के साथ घर पर ही थे फिर सुबह उन्होंने कुछ लबोरो को बुलवाया उन दोनों की लाश को अपनी गाड़ी में रखा और भ्रमपुत्र नदी में दोनों की लाश को बहा दिया।

उन्होंने बताया की उन्हें ये नहीं समाज आ रहा था की अपने २ बेटियों को ये बात कैसे कहे फिर कुछ दिनों के बाद २५ फरवरी को उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को वहा बुलाया फिर उन्हें अपनी गाड़ी में बिठा कर भरमपुत्र नदी के किनारे ले गया और वहा उन लोगों को ये घटना बताई और जैसे ही उन्होंने ये बात उन दोनों को कही तो उन दोनों ने नदी में छलांग लगा दी।

इन सब बातों को सुनने के बाद दिग साहब और बाकि पुलिस वालो ने कहा की ठीक है आपको ये स्टेटमेंट देना होगा मजिस्ट्रेट के सामने उसके बाद जज साहब ने कहा की ठीक है मैं स्टेटमेंट दूंगा। और वो कपडे बदलने के लिए बाथरूम में चले गए उसके बाद बाथरूम से जज साहब के चीखने की आवाज आई दरवाज़ा बंद था इसलिए उन लोगों ने दरवाज़ा तोड़ दिया और देखा की जज साहब ने अपने आप को चाकू से जख्मी कर लिया था। फिर जज साहब को पुलिस ने तुरंत हस्पताल में भर्ती करवाया और फिर उनकी जान बच गई। कुछ दिनों के बाद जज साहब ठीक हो गए फिर पुलिस ने जज साहब से दोबारा पूछताछ की उनके परिवार के 4 लोगों के बारे में इसके बाद जज साहब ने बताया की उन चरों के साथ कोई हादसा नहीं हुआ था बल्कि मैंने ही उन चारों को मार डाला।

उसके बाद पुलिस ने पूछा की अगर इनकी हत्या आपने की है तो इनकी लाश कहा है क्यूँकि पुलिस ने भ्रमपुत्र नदी को खंगाल लिया था और वाहा से कुछ नहीं मिला फिर उन्होने बताया की धुबरी के जज के बंगले में दो गड्ढे है वाहा इन चारों की लाश दफनाई हुई है। इसके बाद 10 अगस्त 1970 को पुलिस ने मेजिस्ट्रेट से वारंट ले कर धुबरी के जज के बंगले में पहुंची और वाहा खुदाई की और वाहा से चार लोगों का कंकाल बरामद किये।

इस दौरान पुलिस को पता चला की इसमें जज साहब का एक नौकर भी इसमें शामिल था फिर उसे भी गिरफ्तार किया गया। इसके बाद इस मामले ने पुरे देश में हड़कंप मचा दिया। पुलिस जज साहब से इन हत्याओं की वजह जानना चाहती थी पर जज साहब ने वजह नहीं बताया उन्होंने ये क़ुबूल किया की ये खून उन्होंने ही किये है पर इसकी वजह नहीं बताई और आज भी ये एक राज़ ही है। इसके बाद इस मामले के लिए एक स्पेशल जज नियुक्त किये गए। 13 नवंबर 1972 से कोर्ट में इनकी पेशी होने थी उससे एक दिन पहले जज साहब ने धुबरी जेल के अंदर ही एक बार और अपनी जान लेने की कोशिश की अपने आप को जख्मी कर लिए इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और पेशी भी टल गई।

इसके कुछ दिनों के बाद कोर्ट में ट्रायल शुरू होता है इस मामले में कोई गवाह नहीं था जिसने इस हत्या काण्ड को होते देखा और इसी लिए पुलिस के लिए बेहद मुश्किल था की कोर्ट में इसे साबित कैसे करे पर जज उपेंद्र नाथ राजखोवा Upendra Nath Rajkhowa ने कोर्ट में अपना जुर्म कुबूल किया और उसी पर 26 जनुअरी 1973 को स्पेशल जज ने फैसला सुनाया और उपेंद्र नाथ राजखोवा (Upendra Nath Rajkhowa) फांसी की सजा दी ।

इस फैसले के खिलाफ जज ने गोवाहाटी हाई कोर्ट में अर्जी लगायी और फिर हाई कोर्ट ने पुरे मामले को सुना और लोअर कोर्ट के फैसले को बरकार रखते हुए फांसी की सजा सुनाई। फिर जज राजखोवा (Upendra Nath Rajkhowa)ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी अर्जी डाली १९७५ में सुप्रीम कोर्ट ने भी पुरे मामले को सुना और लोअर और हाई कोर्ट के फैसले पे मोहर लगा दी।

इसके बाद जज राजखोवा (Upendra Nath Rajkhowa)ने उस समय के राष्ट्रपति के यहाँ अपनी दया याचिका लगाई राष्ट्रपति ने जुर्म को देखते हुए और तीनो कोर्ट के फैसले के मद्दे नज़र दया याचिका को ख़ारिज कर दिया। इसके बाद 14 फरवरी 1976 को जोरहट जेल में सुबह जज उपेंद्र नाथ राजखोवा को फांसी दी गई।

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आज तक किसी को ये नहीं पता की जज साहब ने अपने परिवार के लोगों का क़त्ल क्यों किया।

THE PRESS NOTE

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